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Sunday, May 6, 2012

काजा डायरी 4 - पर्वतों पर रास्ते जीवन हैं तो क्या...

पर्वतों के रास्ते बड़ा दुष्चक्र हैं। उन्हें बनाना मुश्किल, बनाए रखना मुश्किल और न हों तो वहां पहुंचना मुश्किल। इतनी ऊंचाई पर मोटरसाइकिल चलाकर जाते हुए यह ख्याल सहज ही आता है कि रास्ते बनाने वालों ने इतना जोखिम न लिया होता तो भला हम कैसे यहां पहुंचते! फिर जब किसी भूस्खलन की वजह से रास्ते में अटको तो यह ख्याल आता है कि हर जगह पहुंचने की जद्दोजहद में हमने कहीं यहां प्रकृति से जानते-बूझते खिलवाड़ तो नहीं कर लिया!


रास्ते बनाने होंगे तो पहाड़ों को काटना होगा। पहाड़ काटेंगे तो कमजोर होंगे, ढहेंगे। पहाड़ ढहेंगे तो हम दुबारा नई जगह से पहाड़ काटेंगे। इस बार इतना चौड़ा काटेंगे कि ढहने का असर ही न हो या फिर ऊपर से इतना काट देंगे कि वह ढह ही न पाए। आखिर आगे के इलाकों के लिए रसद-पानी-सामान पहुंचाने के लिए बड़े वाहन जाने होंगे तो उनके लिए भी चौड़े रास्ते बनाने होंगे। हम तो अब पहाड़ी नदियों के पानी का भरपूर इस्तेमाल बांध बनाने के लिए भी कर रहे हैं। बांधों पर पर्यावरण के सवाल तो हम यहां नहीं उठा रहे, लेकिन बांध और फिर बिजनी बनाने की मशीनें पहुंचाने के लिए तो बड़े ट्रैलर भी जाएंगे, उनके लिए और चौड़े रास्ते चाहिए होंगे। यह चक्र खत्म नहीं होता, और पहाड़ कटते रहते हैं। पहाड़ भी खामोश नहीं रहते और अपनी बलि लेते रहते हैं।

इतनी दुर्गम जगह पर रास्ते बनाने के भी अपने जोखिम हैं। चूंकि शीत मरुस्थल का यह इलाका वनस्पति विहीन है, इसलिए पहाड़ बेहद कमजोर हैं। पेड़ नदारद हैं और बड़ी चट्टानें भी कम ही हैं। कई जगह पहाड़ के पहाड़ मिट्टी, छोटे पत्थर या बजरी के मिल जाएंगे। उन्हें छेड़ा जाए तो उनका ढहना अवश्यसंभावी है। वहां बारिश बहुत कम होती है, इसलिए वर्षा के जोर से पहाड़ों में भूस्खलन नहीं होता। किन्नौर व स्पीति के राष्ट्रीय राजमार्ग 22 को बनाने व देखरेख का काम सेना के बीआरओ (सीमा सड़क संगठन) व ग्रेफ (जनरल रिजर्व इंजीनियर फोर्स) के पास है। रास्ते भर, आपको कई ऐसे स्मारक बने मिल जाएंगे, जिनपर उन जवानों व अफसरों के नाम लिखे होंगे जिनकी जानें रास्ते या पुल बनाने के दौरान कुर्बान हो गईं।

राजमार्ग के अलावा दूर-दराज के गांवों के लिए संपर्क मार्ग बनाने का काम लोक निर्माण विभाग (पीडब्लूडी) के पास है। रास्ते बनाने व उनके रखरखाव का काम स्थानीय स्तर पर रोजगार का भी बड़ा साधन है। तीन-चार हजार मीटर की ऊंचाई पर बने संपर्क मार्गों पर हर थोड़ी दूरी पर स्थानीय महिलाओं का समूह, सड़क की सफाई करता, गिरे पत्थर हटाता नजर आ जाएगा। महिलाएं बताती हैं कि दिनभर अपने हिस्से की सड़क की देखरेख करने के लिए उन्हें पीडब्लूडी अप्रैल से दिसंबर की पूरी अवधि के लिए अस्सी-नब्बे हजार रुपये का धन अग्रिम दे देता है। सर्दियों के बाकी महीनों के लिए भी अलग से पगार मिलती है।

हर साल सर्दियों के बाद बर्फबारी से बंद हुए रास्तों को फिर खोलना भी इन इलाकों की मशीनरी के लिए बड़ा काम है। इस काम को करने के पीडब्लूडी व ग्रेफ के तरीकों में भी अंतर है। काजा में दबी आवाज में कहा जा रहा था कि इस बार लाहौल व स्पीति घाटियों को जोड़ने वाले कुंजम दर्रे को खोलने का काम भी इसी वजह से लेट हो गया है। अब तक यह काम पीडब्लूडी के पास था, इस बार ग्रेफ के हवाले कर दिया गया है जो अभी तक नीचे से बर्फ साफ करने वाली बड़ी मशीनों का इंतजार कर रहे हैं। पीडब्लूडी के लोग कहते हैं कि हमारे पास होता तो हमने अब तक कुंजम पास खोल दिया होता।

काजा से लौटते हुए फिर दो बार पहाड़ काटे जाने की वजह से मुझे अटकना पड़ा और हर बार मैं एक तरफ पहाड़ का ख्याल करता था तो दूसरी तरफ काजा बाइक से आने के अपने सपने के बारे में।

1 comments:

Manu Tyagi said...

सही है उपेन्द्र जी ,वैसे हमारा सपना तो पूरा हो गया है