Pages

Showing posts with label Summer Destinations. Show all posts
Showing posts with label Summer Destinations. Show all posts

Sunday, April 28, 2013

इन छुट्टियों के मजे दस और


पिछली बार मैंने गर्मियों की छुट्टियों के लिए दस नए आइडिया पेश किए थे। इस बार फिर पेश हैं दस नई थीम और उनके मुताबिक दस शानदार जगहें। आखिर जब गर्मियों की छुट्टियां लंबी हैं तो हमारे आइडिया क्यों खत्म हो जाएं। हमारे आसपास की प्रकृति के रंग इतने विविध हैं तो भला वे रंग हमारे सैर-सपाटे में भी तो झलकने चाहिए। आइए चले कुछ और यात्राओं पर-

View from Binsar
हिमालय: बिनसर
सफेद चोटियों का यह बेमिसाल नजारा
कुमाऊं के हिमालयी इलाके के सबसे खूबसूरत स्थानों में से एक है बिनसर। नैनीताल से महज 95 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस जगह की ऊंचाई समुद्र तल से 2420 मीटर है। हिमालय का जो नजारा यहां से देखने को मिलता है, वह शायद कुमाऊं में कहीं और से नहीं मिलेगा। सामने फैली वादी और उसके उस पार बाएं से दाएं नजरें घुमाओ तो एक के बाद एक हिमालय की चोटियो को नयनाभिराम, अबाधित दृश्य। चौखंबा से शुरू होकर त्रिशूल, नंदा देवी, नंदा कोट, शिवलिंग और पंचाचूली की पांच चोटियों की अविराम श्रृंखला आपका मन मोह लेती है। और अगर मौसम खुला हो और धूप निकली हो तो आप यहां से बद्रीनाथ, केदारनाथ और गंगोत्री तक को निहार सकते हैं। सवेरे सूरज की पहली किरण से लेकर सूर्यास्त तक इन चोटियों के बदलते रंग आपको इन्हें अपलक निहारने के लिए मजबूर कर देंगे। यहां से मन न भरे तो आप थोड़ा और ऊपर जाकर बिनसर हिल या झंडी धार से अपने नजारे को और विस्तार दे सकते हैं। बिनसर ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए भी स्वर्ग है। चीड़ व बुरांश के जंगलों से लदी पहाड़ियों में कई पहाड़ी रास्ते निकलते हैं। जंगल का यह इलाका बिनसर वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी के तहत आता है। इस अभयारण्य में कई दुर्लभ जानवर, पक्षी, तितलियां और जंगली फूल देखने को मिल जाते हैं। बिनसर से अल्मोड़ा लगभग तीस किलोमीटर दूर है। यहां से 35 किलोमीटर दूर जागेश्वर के प्रसिद्ध मंदिर हैं। बिनसर के नजदीक गणनाथ मंदिर भी है। यहा खली एस्टेट भी देखा जा सकता है जहां कभी यहां के तत्कालीन राजाओं का महल हुआ करता था।
कैसे जाएं: बिनसर के लिए सबसे नजदीक का रेलवे स्टेशन काठगोदाम है। वहां से अल्मोड़ा के रास्ते या नैनीताल के रास्ते सड़क मार्ग से बिनसर आया जा सकता है। काठगोदाम के लिए दिल्ली व लखनऊ से ट्रेनें हैं। सबसे निकट का हवाई अड्डा पंतनगर है।

Singapore cruise center
क्रूज: सिंगापुर
समुद्र की लहरों पर मौज-मस्ती
टाइटैनिक की कहानी डराती जितना भी हो, समुद्र की यात्रा के लिए आकर्षित भी खूब करती है। समुद्र की सैर का अपना मजा है। खास तौर पर अगर यह सैर पानी के किसी क्रूज जहाज से हो तो क्या बात है। आम तौर पर बड़े क्रूज जहाज अपने आप में किसी शहर जैसे होते हैं। रहने के लिए शानदार कमरे, मनोरंजन के लिए कई थियेटर, क्लब, अलग-अलग खाने के रेस्तरां, बार, कई तरह की गतिविधियां, खेल-कूद, कैसिनो, शॉपिंग मॉल, स्विमिंग पूल- यहां आपको किसी चीज की कमी महसूस नहीं होगी। क्रूज की दुनिया बिलकुल अलग होती है। अंदर की रंगीनियत अलग और बाहर डेक पर जाएं तो दूर-दूर तक समंदर का नीला पानी। तीन-चार दिन के क्रूज में आपको समुद्र में सैर करते-करते कुछ नई जगहों को देखने का बढ़िया मौका भी मिल जाता है। सिंगापुर को दक्षिण एशिया में क्रूज का सबसे बड़ा हब माना जाता है। भारत में इंटरनेशनल क्रूज के लिए इस तरह का कोई पोर्ट नहीं है। हालांकि कोच्चि से बीच-बीच में कुछ क्रूज लाइन अपनी सेवाएं चलाती रही हैं। सिंगापुर का क्रूज सेंटर कमोबेश किसी हवाई अड्डे सरीखा है। उसी तरह का माहौल, उसी तरह की सहूलियतें। सिंगापुर का क्रूज सेंटर हर साल दस लाख क्रूज यात्रियों के आवागमन को हैंडल करता है। यहां से तीस से ज्यादा क्रूज लाइन के जहाजों की सेवाएं हैं। मलेशिया और इंडोनेशिया के शहरों के लिए फेरी सुविधा भी यहां से है।
कैसे जाएं: सिंगापुर पहुंचने के लिए कई साधन हैं। सिंगापुर का चांगी इंटरनेशनल एयरपोर्ट दुनिया के सबसे व्यवस्ततम एयरपोर्ट में से एक है। दुनिया के साठ से ज्यादा देशों के दो सौ से ज्यादा शहरों के लिए सौ से ज्यादा एयरलाइंस की उड़ानें यहां से हैं। भारत के सभी महानगरों से सिंगापुर के लिए रोजाना कई उड़ानें हैं। दिल्ली से सिंगापुर का प्रति व्यक्ति वापसी किराया लगभग 24 हजार रुपये से शुरू हो जाता है। क्रूज के पैकेज का खर्च अलग होगा।

Asiatic Lions st Gir in Gujarat
सफारी: गिर
जंगल के राजा की मांद में
गुजरात में जूनागढ़ व अमरेली जिलों में फैला गिर नेशनल पार्क भारत में एशियाई शेरों का एकमात्र गढ़ है। यहां के अलावा भारत में जंगल में कहीं ओर शेर नहीं पाए जाते। शेर की गिनती उन जानवरों में होती है जो लुप्त होने का खतरा झेल रहे हैं। इस बात की कोशिश काफी समय से हो रही थी कि गिर के शेरों को कहीं ओर भी बसाया जाए ताकि गिर में कोई आफत आए तो उससे सारे शेर खत्म न हो जाएं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने गिर से कुछ शेरों को मध्य प्रदेश में पालपुर कुनो नेशनल पार्क भेजने का फैसला किया है। इससे एशियाई शेरों को भारत में दूसरा घर मिल जाएगा। जब तक यह नहीं होता, शेरों को देखने के लिए भारत में गिर ही एकमात्र जगह है। लगभग ढाई सौ वर्ग किलोमीटर इलाके में फैले गिर नेशनल पार्क में लगभग चार सौ शेर हैं। बाघ और अन्य बड़ी बिल्लियों के उलट शेर इंसान की मौजूदगी से ज्यादा प्रभावित नहीं होते। शेरों के इंसानी बस्तियों के आसपास रहने की भी घटनाएं देखी जाती रही हैं। शेर बाघ की तरह शर्मिला भी नहीं होता, इसलिए किसी टाइगर रिजर्व में जहां बाघ को देख पाना बड़ा मुश्किल होता है, वहीं गिर में शेरों को अच्छी तादाद में बड़ी आसानी से देखा जा सकता है। मार्च से मई तक का समय  शेरों को देखने के लिए बहुत अच्छा होता है क्योंकि तब वे पानी के लिए अक्सर बाहर दिख जाते हैं। गिर में आम तौर पर तीन सफारी होती हैं- सवेरे 6.30 बजे, सवेरे 9 बजे और दोपहर में 3 बजे। लेकिन सवेरे की पहली सफारी शेरों को देखने के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है क्योंकि तब शेर सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं। सफारी के लिए वाहनों का परमिट लिया जाना होता है। लेकिन सीजन के समय होटल व सफारी, दोनों की बुकिंग पहले करा सकें तो बेहतर होगा। वरना लंबी कतार झेलनी पड़ सकती है। गिर को लेकर शेरों की बात इतनी हो जाती है कि वहां के पक्षियों की बात ही नहीं हो पाती जबकि जाने-माने पक्षी प्रेमी सालिम अली ने कहा था कि गिर में अगर शेर नहीं होते तो वह देश के सबसे खूबसूरत पक्षी अभयारण्यों में से एक होता।
कैसे जाएं: गिर के सबसे निकट का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा अहमदाबाद का है। गिर यहां से 390 किलोमीटर दूर है। मुंबई से दीव (दमन) हवाई अड्डे के लिए भी उड़ान है। वहां से गिर 112 किलोमीटर है। अहमदाबाद से गिर के सड़क सफर में सात से आठ घंटे का वक्त लग जाता है। गिर के निकट का बड़ा रेलवे स्टेशन  राजकोट है। राजकोट से गिर 164 किलोमीटर दूर है और इस सफर में तीन से चार घंटे का वक्त लग जाता है। इसके अलावा ट्रेन से गिर से 60 किलोमीटर दूर जूनागढ़ और 40 किलोमीटर दूर वेरावल भी जाया जा सकता है।

Guru's langar at Golden Temple, Amritsar
फूड: अमृतसर
शुरुआत गुरु के लंगर से
आम तौर पर अमृतसर में तीन तरह के सैलानी जाते हैं- काम-धंधे वाले, धार्मिक (स्वर्ण मंदिर के लिए) और इतिहास प्रेमी (वाघा बॉर्डर व जलियांवाला बाग के लिए)। लेकिन इसमें एक चौथी फेहरिस्त उन सैलानियों की भी जोड़ी जा सकती है जो अमृतसर स्वाद के लिए जाते हैं। पंजाब को हमारे उत्तर भारत के कई  जायकों का दाता माना जा सकता है। लेकिन जो बात अमृतसर के जायके में है, वो और कहीं नहीं। अमृतसर में खाने की बात हो तो वो गुरु के लंगर के बिना शुरू नहीं हो सकती। हर सैलानी के पहले कदम उसी ओर पड़ते हैं। स्वर्ण मंदिर के कड़ाह प्रसाद और लंगर को चखे बिना बात आगे नहीं बढ़ती। कतार लगाकर कड़ाह प्रसाद लेना, या सबके साथ पंगत में बैठकर लंगर चखना केवल स्वाद की बात नहीं है। उसका असली स्वाद तो उस माहौल व ऐतिहासिक परंपरा में है।
अमृतसर से मिले जो स्वाद बाकी देश ने भी सर-आंखों पर रख लिए उनमें सबसे पहला मक्की की रोटी और सरसों का साग है। लेकिन चूंकि यह सर्दियों का खाना है, इसलिए इसके लिए तब तक इंतजार करना होगा। लेकिन बाकी सालभर आप अमृतसरी कुल्छे व छोले जरूर खा सकते हैं। उसके बाद गिलास भरकर ठंडी लस्सी  आपको भोजन में तृप्ति का अहसास ला देती है। दरअसल मक्खन के साथ आलू के परांठे खाने और उन्हें लस्सी से हजम करने का स्वाद भी हमें अमृतसर से ही मिला है। फिरनी यहां का अलग जायका है और अक्सर शाम के खाने का अंत आप उससे करना चाहेंगे। जो लोग मांसाहारी हैं वे यहां के कीमा नान के साथ मिलने वाले तंदूरी चिकन का स्वाद याद रखेंगे। अमृतसरी नान और बटर चिकन भी उतना ही प्रसिद्ध है। हालांकि कई दुकानें हैं जो अपने स्वाद के लिए प्रसिद्ध हैं लेकिन ठेठ जायके के लिए स्वर्ण मंदिर के आसपास की दुकानों या ढाबों पर जाएं। बड़ी होटलों में वह बात नहीं बनेगी।
कैसे जाएं: अमृतसर अब अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है और दिल्ली से यहां के लिए सीधी उड़ानें हैं। नई दिल्ली से अमृतसर के लिए रोजाना स्वर्ण शताब्दी है। बाकी शहरों से भी अमृतसर के लिए कई ट्रेनें हैं। इन सबके अलावा जीटी रोड पर स्थित अमृतसर का सफर आप बस से या अपने वाहन से भी कर सकते हैं।

Glittering Macau
फैंटेसी: मकाऊ
एक चमकती-मचलती दुनिया
मकाऊ की दुनिया चकाचौंध करने वाली है। एक काल्पनिक सी। चीन के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित यह जगह एक देश- दो व्यवस्थाओं का नमूना है। चीन में ही हांगकांग इसका दूसरा उदाहरण है। विशेष क्षेत्र होने के कारण इसे सुविधाएं भरपूर मिलती हैं और बाकी देश के कानून भी इसपर लागू नहीं होते। जाहिर है, कि यह इसकी टूरिज्म इंडस्ट््री के शानदार तरीके से फलने-फूलने की बड़ी वजह है। हालांकि मकाऊ एक ऐतिहासिक शहर है और सैकड़ों सालों से चीन से जाने वाले सिल्क के लिए एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र रहा है, लेकिन आज का मकाऊ एक जगमगाता और चकाचौंध करने वाला शहर है। सब तरफ वैभव बिखरा पड़ा है। मकाऊ की प्रसिद्धि की एक वड़ी वजह वहां के कैसिनो और यहां की गैम्बलिंग की दुनिया है। इतनी ज्यादा कि यहां की गिनती अमेरिका में लास वेगास के बाद होने लगी है। यहां की रातों के नजारे अलग ही होते हैं। यहां दिन व रात में आसमान का रंग बेशक बदल जाए, माहौल की रंगीनियत चौबीसों घंटे एक सरीखी रहती है। यहां के वैभव ने एक से बढ़कर एक रिजॉर्ट व बाजार। खड़े कर लिए हैं। किसी समय पुर्तगाल का उपनिवेश होने की वजह से मकाऊ में चीन के साथ-साथ यूरोपीय शैली भी भरपूर झलकती है। वहीं मकाऊ टॉवर एडवेंचर का गढ़ है।
कैसे पहुंचे: मकाऊ का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा ताइपा द्वीप पर है। यह द्वीप मकाऊ के फेरी टर्मिनल से 15 मिनट के सफर पर स्थित है। सैलानियों के लिए बड़ा आकर्षण होने की वजह से मकाऊ के लिए दुनिया भर से उड़ानें हैं।

Bungee jumping at Queenstown, New Zealand
एक्सट्रीम: क्वींसटाउन
दुनिया की रोमांच राजधानी
उस शहर जाने की कल्पना ही रोमांचक हो सकती है जिसे दुनिया की एडवेंचर कैपिटल के रूप में शोहरत हासिल हो। जिन्हें हम एक्सट्रीम एडवेंचर की संज्ञा देते हैं, वे सभी यहां हैं। हम बात कर रहे हैं न्यूजीलैंड के क्वींसटाउन शहर की।  कहा जाता है कि उन्नीसवीं सदी के मध्य में जब क्वींसटाउन में शॉटओवर नदी में सोना मिलने की खबर फैली तो लोग यहां उमड़ने शुरू हो गए थे। आखिरकार जब सोना खत्म हो गया तो यहां पहुंचे लोगों का ध्यान यहां के पहाड़ों और नदियों की खूबसूरती पर गया और तब उन्होंने यही बसने का फैसला कर लिया। रोमांच में यहां शुरुआत पिछली सदी के मध्य में स्कीइंग से हुई। 1970 के दौरान जेट बोटिंग की शुरुआत हुई। यह एक तरह से विशुद्ध रूप से रोमांच की दुनिया को क्वींसटाउन की देन थी। शॉटओवर नदी की गहरी कंदराओं में से जेटबोट की राइड का रोमांच ही अलग है। कुछ ही समय बाद रिवर राफ्टिंग भी क्वींसटाउन की नदियों में शुरू हो गई। 1988 में ऐ जे हैकट ने यहां बंजी जंपिंग की शुरुआत की। क्वींसटाउन को बंजी जंपिंग का जनक माना जाता है। आज यहां बंजी जंपिंग की कई साइट हैं। एक समय तो हैकट एंड कंपनी 450 मीटर की ऊंचाई से हेलीकॉप्टर से बंजी जंपिंग करा रहे थे। हालांकि सरकारी नीतियां बदलने से बाद में उसे रोकना पड़ा। क्वींसटाउन ही टेंडम पैरापेंटिंग व कमर्शियल स्काइडाइविंग का भी मुख्य अड्डा है। इसके अलावा यहां टेंडम हैंग ग्लाइडिंग, पैरासेलिंग व एब्सेलिंग जैसी गतिविधियां भी होती हैं। सैलानी क्वींसटाउन केवल एडवेंचर के लिए जाते हैं, जबकि वहां की प्राकृतिक खूबसूरती भी किसी जगह से कम नहीं।
कैसे जाएं: न्यूजीलैंड के दक्षिणी द्वीप के दक्षिण-पश्चिमी कोने में स्थित क्वींसटाउन में हालांकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, लेकिन यहां की सारी अंतरराष्ट्रीय उड़ानें आस्ट्रेलिया के विभिन्न शहरों से होकर हैं।

Toy train at Darjeeling
किड्स: दार्जीलिंग
मस्ती भरी गुदगुदाती छुट्टियां
दार्जीलिंग वैसे भी देश के सबसे लोकप्रिय हिल स्टेशनों में से एक है, लेकिन परिवार के साथ खास तौर पर बच्चों को लेकर आनंद मनाने के लिए भी यह खासी मजेदार जगह है। यहां थोड़ी मस्ती भी हो जाएगी, थोड़ा घूमना भी, थोड़ा एडवेंचर और थोड़ा सीखना भी। दार्जीलिंग देश की उन गिनी-चुनी जगहों में से एक है जहां अब भी छोटी लाइन की रेलगाड़ी चलती है। इनके छोटे आकार के चलते ही उन्हें टॉय ट्रेन कहा जाने लगा है। दार्जीलिंग की टॉय ट्रेन बॉलीवुड की कई फिल्मों में रंग जमा चुकी है- आराधना से लेकर बर्फी तक। छोटी लाइन की गाड़ी बच्चों के साथ बड़ों के लिए भी बड़ी आकर्षक होती है। दार्जीलिंग के करीब पहुंचते-पहुंचते तो उससे दिखने वाला नजारा भी बेहद शानदार हो जाता है। घूम स्टेशन के बाद पटरी पर लूप बना हुआ है। वहां खूबसूरत बगीचा और सामने कंचनजंघा समेत हिमालय की बर्फीली चोटियां देखने के लिए बड़ी सी दूरबीन भी है। दार्जीलिंग में एक छोटा सा जू भी है। बच्चों को उसमें भी बहुत मजा आएगा। दार्जीलिंग की चाय तो बेहद मशहूर है ही। बच्चों को पास के किसी चाय बागान में ले जाकर चाय बनने की सारी प्रक्रिया की जानकारी दी जा सकती है। यह उनके लिए नई जानकारी देने वाला होगा। बच्चे रोमांच प्रेमी हों तो दार्जीलिंग के आसपास कई छोटे-छोटे व आसान ट्रैक भी हैं। उन्हें वहां भी ले जाया जा सकता है।
कैसे जाएं: दार्जीलिंग के लिए बड़ी लाइन का सबसे निकट का रेलवे स्टेशन दिल्ली-गुवाहाटी रेलमार्ग पर न्यू जलपाईगुड़ी है।  वहां से सिलीगुड़ी महज चार किलोमीटर दूर है। सिलीगुड़ी से ही दार्जीलिंग के लिए छोटी लाइन की ट्रेन या बसें-टैक्सी मिलेंगी। हवाई यात्रा के लिए बागडोगरा सबसे निकट का हवाई अड्डा है।  वहां से सड़क मार्ग से दार्जीलिंग जाना होगा।

Beautiful world deep in the sea
डाइविंग: लक्षद्वीप
समुद्र की गहराइयों में
लक्षद्वीप यानी एक लाख द्वीप। ऐतिहासिक रूप से इस नाम के पीछे जो भी वजहें रही हों, भारत के दक्षिण-पश्चिमी सिरे से लगभग  200 से 440 किलोमीटर की दूरी में स्थित इस द्वीप समूह में 39 छोटे-बड़े द्वीप हैं। ये द्वीप मालदीव के उत्तर की ओर अरब सागर में हैं। अमीनदीव, लक्कादीव और मिनिकॉय द्वीपों को भारत के कोरल द्वीप भी कहा जाता है। इनमें से ज्यादातर के तटों के पास समृद्ध कोरल रीफ हैं। खूबसूरत होने के बावजूद इन्हें ज्यादा सैलानी नहीं मिल पाए क्योंकि कुछ साल पहले तक यहां सैलानियों के लायक ढांचा व इंतजाम नहीं थे। लेकिन अब स्थिति बदल रही है।  सारे द्वीपों के आसपास लैगून व कोरल रीफ होने की वजह से ये वाटर स्पोट्र्स के लिए बेहद माफिक हैं। कोई हैरत नहीं कि आनेवाले समय में लक्षद्वीप का डंका वाटर स्पोट्र्स के लिए दुनियाभर के सैलानियों में बजने लगे। यहां कयाकिंग, कैनोइंग, याटिंग, स्नोर्कलिंग, विंड सर्फिंग, वाटर स्कीइंग और स्कूबा डाइविंग का आनंद लिया जा सकता है। कई ऑपरेटर वहां ये सब कराने लगे हैं। पानी के नीचे जाकर वहां के जलजीवन का नजारा लेना अपने आप में बेहद रोमांचक है।
कैसे पहुंचे: केरल में कोच्चि से लक्षद्वीप के लिए पानी के जहाज चलते हैं। इस सफर में 14 से 20 घंटे लग जाते हैं। इसके अलावा कोच्चि से लक्षद्वीप के अगाती हवाई अड्डे के लिए भी सप्ताह में छह दिन उड़ानें हैं। अगाती से कावरती व बंगाराम के लिए हेलीकॉप्टर सेवाएं हैं।

ग्लैमर: पेरिस
एन इवनिंग इन पेरिस
सीन नदी के किनारे बसा फैशन व ग्लैमर का यह शहर हममें से कई के लिए कल्पनाओं का शहर रहा है। पेरिस की जगमगाती शामों को सिनेमा के पर्दों पर देख-देखकर हममें से कई का मन लुभाया होगा। पेरिस का वह दबदबा आज भी कायम है। पेरिस को सबसे खूबसूरत व सबसे रोमांटिक शहरों में से एक होने की शोहरत हासिल है। संस्कृति, कला, फैशन, फूड व डिजाइन के क्षेत्र में पेरिस का असर समूची दुनिया पर है। पेरिस को सिटी ऑफ लाइट्स के साथ-साथ फैशन की राजधानी भी कहा जाता है। दुनिया के सबसे शानदार व भव्य डिजाइनर्स और कॉसमेटिक्स का भी गढ़ पेरिस ही है। लेकिन इस शहर का जुड़ाव इतिहास से भी उतना ही है। सीन नदी समेत शहर का काफी बड़ा हिस्सा यूनेस्को की विश्व विरासत की सूची में शामिल है। आखिरकार यहीं तो एफिल टॉवर भी है जो दुनिया में सबसे घूमे जाने वाली जगहों में से है। टोक्यो के बाद यहीं पर दुनिया में सबसे ज्यादा मिशेलिन रेस्तरां (रेस्तराओं की क्वालिटी का अंतरराष्ट्रीय पैमाना) हैं। पेरिस की लोकप्रियता इतनी ज्यादा है कि यहां हर साल साढ़े चार करोड़ सैलानी आते हैं। पेरिस को ग्लैमर की दुनिया में इसलिए भी काफी ऊपर आंका जाता है क्योंकि यहां कंसर्ट, थियेटर, सिनेमा, फैशन शो... हर वक्त कुछ न कुछ होता रहता है। यहां के थीम पार्क और गुदगुदाती शामें, आपको चमत्कृत करती रहेंगी। अलग-अलग संस्कृतियों को जगह देने के कारण भी पेरिस को बाकी शहरों की तुलना में ज्यादा पसंद किया जाता है।
कैसे पहुंचे: पेरिस में रोजाना कितने लोग उमड़ते हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां तीन अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे हैं। दुनियाभर से उड़ानें यहां पहुंचती है। भारत से भी वहां के लिए रोजाना कई उड़ानें हैं (वापसी किराया 35 हजार रुपये से शुरू)। पेरिस यूरोप के बाकी सभी बड़े शहरों से हाई स्पीड रेल नेटवर्क से भी जुड़ा है।

Badrinath
तीर्थ: चारधाम
जहां आस्था तकलीफ नहीं देखती
भारत में तीर्थ हर कोने में हैं। लोग पूरी श्रद्धा के साथ इन जगहों पर जाते भी हैं। भारत में पर्यटन में सबसे बड़ी हिस्सेदारी धार्मिक पर्यटन की ही है। यह भी बड़ी रोचक बात है कि भारत में ज्यादातर धार्मिक यात्राएं बेहद कष्टसाध्य हैं। लेकिन उससे भी लोगों का उत्साह कम नहीं होता। देश की सबसे प्रमुख तीर्थयात्राओं में चारधाम यात्रा भी एक है। वैसे तो देश के चार बड़े धाम चारों दिशाओं में हैं। लेकिन उत्तराखंड में बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री व यमुनोत्री की यात्रा को भी प्रचलित अर्थों में चारधाम यात्रा ही माना जाता है। ये चारों स्थान हिमालय पर्वतमाला में ऐसे स्थानों पर हैं जहां साल के काफी समय बर्फ ही जमा रहती है। इसलिए यहां की यात्रा तभी संभव हो पाती है जब बर्फ कम होने पर रास्ते खुलते हैं। पारंपरिक रूप से बद्रीनाथ व केदारनाथ के पट खुलने के बाद यात्रा आरंभ होती है। यात्रा के ज्यादातर दिन उत्तर भारत में मानसूनी बारिश वाले होते हैं, इसलिए भी यह यात्रा तीर्थयात्रियों के लिए कष्टदायक हो जाती है। फिर भी लाखों लोग हर साल चारधाम यात्रा पर जाते हैं।
कैसे जाएं: चमोली जिले में स्थित बद्रीनाथ तक बसें व कारें जाती हैं। ऋषिकेश से बद्रीनाथ पहुंचने में पूरा दिन लग जाता है। द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक केदारनाथ के लिए गौरीकुंड से 14 किलोमीटर का पैदल मार्ग है। गंगोत्री ऋषिकेश से 265 किलोमीटर दूर है और वहां तक बसें व कारें जाती हैं। हां, आगे गोमुख के लिए पैदल जाना होगा। इसी तरह ऋषिकेश से 222 किलोमीटर दूर यमुनोत्री के लिए धरासू बैंड से रास्ता अलग फटता है। फूल चट्टी के बाद यमुनोत्री के लिए आठ किलोमीटर का ट्रैक है।

Sunday, March 31, 2013

इन गर्मियों के दस मुकाम


इन गर्मियों की छुट्टियों में सैर-सपाटे के लिए पेश हैं दस थीम और उनके लिए दस जगहें। कुछ देश में तो कुछ बाहर... कुछ खर्चीली तो कुछ जेब के माफिक... कुछ जांची-परखीं और कुछ नईं, लेकिन हरेक एक-दूसरे से बढ़कर खूबसूरत व रोमांचक। चुनिए अपनी पसंद की छुट्टियां।

Monastry in Bhutan
एक्सप्लोर: भूटान
हमारे पड़ोस का यह छोटा सा अनजाना देश
एक ऐसा देश जहां का युवा राजा आपको अपने देश की सड़कों पर साइक्लिंग करता मिल जाएगा, भूटान हमारे लिए बेहद नजदीक है, बेहद जाना-पहचान लेकिन थोड़ा अनजाना भी। भूटान ट्रैकिंग के शौकीनों के लिए तो स्वर्ग सरीखा माना ही जाता है, साथ ही नई जगहों और नई संस्कृतियों को जानने-समझने वालों के लिए भी यह बेहद रोमांचकारी जगह है। यह देश महायान बौद्धों की वज्रयान धारा के आखिरी गढ़ के रूप में माना जाता है, जिसे तांत्रिक बौद्ध परंपरा भी कहा जाता है। महज सात लाख की आबादी वाला यह देश राजशाही के साथ-साथ तमाम प्राचीन परंपराओं को अब भी अपने सीने से लगाए हुए है। यहां के गोम्पाओं की सैर से आपको इसका अहसास हो जाएगा। हिमालय की मानो गोद में बसे इस देश का राष्ट्रीय खेल तीरंदाजी है। यहां का सत्तर फीसदी से ज्यादा इलाका जंगलों से ढका है। इसीलिए यहां की संस्कृति के साथ-साथ यहां का दुर्लभ वातावरण भी दुनियाभर के सैलानियों को लुभाता है। मार्च से मई और सितंबर से नवंबर का समय जाने के लिए सर्वोत्तम।
कैसे जाएं: तीन तरफ से भारत और उत्तर में तिब्बत से घिरे भूटान में केवल एक ही अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पारो में है। सात हजार फुट से ज्यादा ऊंचाई पर स्थित यह हवाई अड्डा अगल-बगल में 16 हजार फुट तक की ऊंचाई वाली पहाडि़यां हैं। पारो से दिल्ली, कोलकाता, गुवाहाटी व बोधगया के लिए सीधी उड़ान हैं। पारो से काठमांडू की उड़ान दुनिया की सबसे ऊंची पांच चोटियों में से चार के ऊपर से होकर गुजरती है। इसके अलावा आप पश्चिम बंगाल में बागडोगरा एयरपोर्ट या न्यूजलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन से सड़क के खूबसूरत रास्ते भी भूटान में फुंटशोलिंग जा सकते हैं। वहां से राजधानी थिम्फू पहुंचने में छह घंटे से ज्यादा लगेंगे। इसके अलावा दक्षिण भूटान में गेलेफू और असम की तरफ सामद्रूप जोंगखार से भी सड़क के रास्ते भूटान में प्रवेश किया जा सकता है। भारतीयों को यहां वीजा नहीं चाहिए होता।

लग्जरी: दुबई
शानो-शौकत का दूसरा नाम
दुबई हमेशा से भारतीयों के लिए शानो-शौकत व बेशुमार दौलत की जगह के रूप में रहा है। दुनिया में वैभवशाली शहरों का कोई प्रतिमान ढूंढना हो तो दुबई से बेहतर कोई नहीं। तेल की अकूत संपदा ने वहां हर वो चीज ला खड़ी की है जिसकी कल्पना की जा सकती है। इसीलिए जब दुनिया घूमने की बात होती है तो उसमें दुबई सबसे ऊपर होता है। हरियाली की कमी होने के बावजूद रेगिस्तान के इस शहर को धरती का जन्नत कहा जा सकता है। आज दुबई के पास दुनिया के सबसे ऊंचे और सर्वाधिक कमरों वाले होटल हैं। इसके अलावा दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा (829.84 मीटर) और दुबई शापिंग माल उसकी शोहरत में चार चांद लगाने के लिए काफी हैं। दुबई माल सहित पूरे दुबई में कुल सत्तर शापिंग माल है जो दुनिया के किसी मुल्क के इक्का-दुक्का शहरों में ही हैं। आलम यह है कि यहां पूरे सालभर विदेशी पर्यटकों की यहां भरमार रहती है। तेज भागती कारों के बीच भी यह शहर इतना शांत रहता है कि पर्यटकों की छुट्टियां कब बीत जाती हैं उन्हें पता ही नहीं चलता।
कैसे जाएं: खाड़ी के देशों में भारतीयों की बड़ी संख्या में मौजूदगी की वजह से दुबई उन जगहों में से है जहां के लिए भारतीय शहरों से सबसे ज्यादा उड़ानें हैं। खाली दिल्ली से ही दुबई के लिए रोजाना कम से कम दस सीधी उड़ान हैं। सफर लगभग पौने चार घंटे का है। इसी तरह भारत के कई अन्य महानगरों से दुबई के लिए उड़ानें हैं। 15 हजार रुपये से लेकर 18 हजार रुपये तक में आपको दुबई का वापसी हवाई टिकट मिल सकता है।

Shopping street in Hongkong
शॉपिंग: हांगकांग
यहां जो चाहें सो पाएं
हांगकांग को एशिया के सबसे पसंदीदा शॉपिंग डेस्टिनेशन में से एक माना जाता है। पिछले डेढ़ सौ सालों से हांगकांग विश्व व्यापार के मुख्य केंद्रों में से रहा है। पहले ब्रिटेन और अब चीन के आधिपत्य में भी उसकी वह लोकप्रियता अब भी कायम है। जिन लोगों को शॉपिंग पसंद है, उनके लिए हांगकांग की गगनचुंबी इमारतों में स्थित एक से बढ़कर एक मॉल स्वर्ग सरीखे हैं। हर तरह की चीजें और हर तरह की जगहें। चाइनीज स्नैक्स व ब्रू, कंप्यूटर व इलेक्ट्रॉनिक्स, फैशन व ब्यूटी, होम डेकोरेशन व फर्नीचर, ज्वैलरी व घडि़यां, शेड्स, पारंपरिक क्रॉकरी व कपड़े... हांगकांग आईलैंड में एडमिरल्टी, कॉजवे बे, शेंग वान, स्टेनले, वान चाई, सिम शा सुई, कोलून ईस्ट व वेस्ट, मोंग कोक, शाम शुई पो, याऊ मा तेई व लंताऊ शॉपिंग के प्रमुख इलाके हैं। इनमें भी तमाम शॉपिंग मॉल हैं जहां सुई से लेकर कार तक सब एक छत के नीचे मिल जाएंगे। बस हांगकांग पहुंचते ही निगाह शॉपिंग फेस्टिवल और तमाम प्रोमोशन पर रखें ताकि यथासंभव डिस्काउंट पा सकें। हांगकांग के कई बाजारों में, खास तौर पर छोटी दुकानों व फुटपाथ बाजारों में आप भारत की तरह ही बार्गेनिंग भी कर सकते हैं।
कैसे जाएं: हांगकांग के लिए भारत के कई बड़े शहरों से रोजाना कई सीधी उड़ानें हैं। दिल्ली से हांगकांग के लिए वापसी किराये की शुरुआत 15 हजार रुपये से हो जाती है।

Fantasia in Phuket
फन: फुकेत
मौज मस्ती का गढ़ अब पहुंच में 
वैसे तो पूरा थाईलैंड मस्ती के अलग-अलग रंगों से सजा है। लेकिन उनमें भी फुकेत सबसे खास है। फुकेत थाईलैंड का सबसे बड़ा द्वीप है। दुनिया के कई सबसे खूबसूरत समुद्र तटों में से एक इसके आसपास हैं। सैलानियों के बीच फुकेत का इतना बड़ा आकर्षण है कि पर्यटन ने इसे थाईलैंड का सबसे समृद्ध इलाका बना दिया है। किसी चहकते तटीय शहर के सारे गुण इसमें हैं। बीच पर तमाम तरह की गतिविधियां का मजा लिया जा सकता है, जिनमें स्नोर्कलिंग, डाइविंग, जेट-स्कीइंग, पैरासेलिंग आदि प्रमुख हैं। थाईलैंड के बीच रिजॉर्टों में से पत्रया के बाद फुकेत की नाइटलाइफ सबसे चमक-दमक वाली है।  यहां भी पाटोंग बीच सबसे सक्रिय है। गो-गो बार के अलावा यहां कई अन्य बार, डिस्को व रेस्तरां भी हैं। फुकेत के तमाम बीचों पर प्रसिद्ध थाई मसाज या फुट मसाज का भी आनंद लिया जा सकता है। यहां का थीम पार्क फेंटेसिया 140 एकड़ में फैला है और अद्भुत स्टेज प्रदर्शनों और स्पेशन इफेक्ट्स के जरिये थाई संस्कृति से आपको रु-ब-रु कराता है। यहां के आनंद में आपको लास वेगास जैसा आभास होगा। इसके अलावा भी यहां कई और फन व थीम पार्क हैं।
कैसे जाएं: अभी तक फुकेत जाने के लिए पहले बैंकाक जाना होता था। लेकिन अब दिल्ली व मुंबई से सप्ताह में दो बार थाई एयरवेज की थाई स्माइल सेवा की सीधी उड़ानें हैं। दरअसल भारत में किसी शहर से फुकेत के लिए यह पहली सीधी उड़ानें हैं। यानी अगर आपको केवल फुकेत जाकर अपनी छुट्टियां बितानी हैं तो उसके लिए बैंकाक जाने की कोई जरूरत नहीं। समय व धन, दोनों की बचत है। लेकिन अगर आप बैंकाक घूमकर फुकेत जाना चाहते हैं तो बैंकाक से फुकेत के लिए उड़ानें भी हैं और बसें भी। इसके अलावा फुकेत कई क्रूज जहाजों के रास्ते पर भी है। यानी आप सिंगापुर या पेनांग से समुद्र के रास्ते किसी क्रूज पर भी फुकेत आ सकते हैं।

Rhinos at Dudhwa
वाइल्ड: दुधवा
इस जंगल से प्रेम हो जाए
दुधवा टाइगर रिजर्व टाइगर के लिए तो देश में प्रसिद्ध है ही, असम में काजीरंगा के बाद देश में वह अकेली जगह है जहां एक सींग वाला गैंडा पाया जाता है। आप हाथी पर बैठकर यह गैंडा नजदीक से देख सकते हैं। लेकिन दुधवा की एक बड़ी खासियत उसका जंगल भी है। यहां के जंगल सरिस्का, कॉर्बेट, रणथंबौर या बांधवगढ़ के जंगलों से काफी अलग हैं। यहां का जंगल इतना घना है कि जंगल में बने सफारी के रास्ते के अगल-बगल जानवरों को ढूंढना बहुत मुश्किल होता है। आप टाइगर यहां तभी देख सकते हैं, जब वो जंगल से निकलकर आपके रास्ते में आ जाए। दुधवा टाइगर पार्क के दो हिस्से हैं- दुधवा रेंज और कतर्निया घाट रेंज। दुधवा जाने वाले ज्यादातर सैलानी दुधवा रेंज तक ही सीमित रह जाते हैं। कतर्निया घाट रेंज एक अछूते जंगल की तरह है। गिरवा और कौडियाला नदियां इस सेंक्चुअरी से होकर गुजरती हैं। बाद में ये दोनों नदिया मिलकर घाघरा बन जाती हैं। टाइगर के अलावा घडि़याल व डॉल्फिन के लिए भी यहां जाया जा सकता है।
कैसे पहुंचे: दुधवा नेशनल पार्क उत्तर प्रदेश के खीरी जिले में पलिया तहसील में पड़ता है। सबसे निकट का हवाई अड्डा लखनऊ में है। लखनऊ से सड़क के रास्ते लखीमपुर, मैलानी व पलिया होते हुए दुधवा की दूरी लगभग 220 किलोमीटर है। लखनऊ से इसी रास्ते दुधवा तक छोटी लाइन की ट्रेन भी चलती है। इस रेल लाइन का काफी रास्ता टाइगर रिजर्व के बीच में से होकर निकलता है। वैसे दुधवा के सबसे निकट का बड़ा रेलवे स्टेशन दिल्ली-लखनऊ रेल मार्ग पर शाहजहांपुर है। वहां से मैलानी होते हुए दुधवा महज 107 किलोमीटर है। कतर्निया घाट के लिए एक रास्ता दुधवा के बीच से भी होकर निकलता है। मुख्य रास्ता दुधवा से वापस पलिया होकर है। सीधे कतर्निया जाना हो तो बहराइच से वह 86 किलोमीटर दूर है।

Guru Dongmar Lake
एडवेंचर: सिक्किम
17,000 फुट पर झील की सैर
यूं तो समूचा सिक्किम रोमांचक पर्यटन का गढ़ है, लेकिन हम यहां बात कर रहे हैं उत्तर सिक्किम में स्थित गुरुडोंगमार लेक की। यहां से चीन की सीमा महज पांच किलोमीटर दूर है। गुरु डोंगमार लेक दुनिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित झीलों में से एक है। 17 हजार फुट से भी ज्यादा की ऊंचाई पर स्थित यह झील नवंबर से लेकर मई की शुरुआत तक जमी रहती है। यह झील कंचनजंघा रेंज के उत्तर-पूर्व में स्थित है। इससे निकलने वाली एक धारा तीस्ता नदी के लिए उद्गम का काम भी करती है। तीस्ता नदी दरअसल शो लामो झील से निकलती है जो गुरु डोंगमार लेक से पांच किलोमीटर दूर है। आप दोनों झीलों के बीच ट्रैक कर सकते हैं लेकिन इसके लिए आपको सेना से पहले इजाजत लेनी होती है क्योंकि सीमा के नजदीक होने से इसे संवेदनशील इलाका माना जाता है। गुरु डोंगमार दरअसल बौद्ध गुरु पद्मसंभव का ही नाम है। सिक्किम के बौद्ध मतावलंबी पद्मसंभव की पूजा करते हैं। माना जाता है कि पद्मसंभव ने यहां तंत्र साधना की थी। इस झील का संबंध गुरु नानक देव से भी माना जाता है। यहां झील के किनारे एक सर्वधर्म प्रार्थना स्थल भी है। यहां ठंड बहुत होती है और हवा बहुत कम। जाने के लिए खुद को तैयार करना होता है। यहां ज्यादा देर रुका भी नहीं जा सकता। एक ऐसा एडवेंचर जो सबके लिए सुलभ है।
कैसे पहुंचे: समूचे सिक्किम के लिए हवाई जहाज से पहुंचने का जरिया केवल बागडोगरा के रास्ते और ट्रेन से पहुंचने का रास्ता न्यू जलपाई गुड़ी से है। न्यूजलपाई गुड़ी से गंगटोक का सफर सड़क मार्ग से करना होता है। बागडोगरा से गंगटोक तक हेलीकॉप्टर की सेवा भी है। गंगटोक से मंगन होते हुए उत्तर सिक्किम में लाचेन पहुंचना होता है। लाचेन से एक रास्ता युमथांग और दूसरा गुरुडोंगमार जाता है। बस-टैक्सी उपलब्ध हैं।

Beaches of Mauritius
बीच: मॉरीशस
समुद्र का निराला संसार
दुनिया के बीच डेस्टिनेशन में जिन जगहों को मुख्य रूप से गिना जाता है उनमें मॉरीशस टॉप पर है। हिंद महासागर के नीले गहरे पानी में स्थित मॉरीशस अनूठा है। रंग, संस्कृति और स्वाद में जो विविधता यहां है, वह यहां गुजारे पलों को यादगार बना देती है। इसकी भौगोलिक स्थिति एेसी है कि लगभग पूरे साल यहां का मौसम लगभग एक सरीखा रहता है। ना बहुत ज्यादा गर्मी पड़ती है और न ज्यादा ठंड। दिसंबर से मार्च के महीने सबसे ज्यादा बारिश वाले होते हैं, इसलिए उनको छोड़कर बाकी पूरे साल यहां कभी भी जाया जा सकता है। मॉरीशस के सफेद रेतीले तट कोरल रीफ बैरियर से सुरक्षित हैं। यहां का लगभग समूचा तट कोरल रीफ से घिरा है, सिवाय दक्षिणी सिरे के कुछ अपवाद को छोड़कर। इसीलिए बाकी तटों पर समुद्र जहां शांत होता है, वहीं दक्षिणी हिस्से में वह बहुत अशांत है। वहां चत्रनी तट पर समुद्र की पछाड़ें देखकर आप मुग्ध हो सकते हैं। मॉरीशस के मुख्य द्वीप के चारों ओर कई छोटे-छोटे निर्जन द्वीप भी हैं। हम भारतीयों के लिए मॉरीशस उन जगहों में से है, जहां से हमारा भावनात्मक लगाव है। हमारी संस्कृति साझी है और लोग भी। राजधानी पोर्ट लुई पश्चिमी तट पर स्थित है। उत्तर का इलाका मैदानी है और यहां देश के कई सबसे खूबसूरत बीच हैं। समुद्र तटों की रंगीनियत भी सबसे ज्यादा इसी इलाके में है। वहीं पूर्वी मॉरीशस के समुद्र तट सुकून से कुछ पल बिताने के लिए हैं। यहां के समुद्र तट की खूबसूरती खोह और लैगून में हैं। यहां ब्लू बे और बेले मेरे सबसे लोकप्रिय समुद्री इलाकों में से हैं। उधर पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी तट रोमांच प्रेमियों के लिए स्वर्ग हैं। यहां आप सर्फिंग, स्नोर्कलिंग, डीप शी फिशिंग, जैसे ज्यादातर समुद्री खेल का आनंद आप ले सकते हैं। यहां टेमेरिन बे के आसपास आप डॉल्फिन भी देख सकते हैं। दक्षिणी इलाके का रंगरूप बाकी देश से पूरी तरह अलग है। ग्रिस-ग्रिस ही मॉरीशस के समुद्री तट का अकेला ऐसा इलाका है जहां कोरल रीफ नहीं हैं। वहां किनारे ऊंची पहाडि़यां और गहरी खाइयां देखने को मिल जाएंगी। मॉरीशस का भीतरी इलाका संस्कृति के विभिन्न रंगों से रंगा है। यहां की शिवरात्रि आपको भारत की शिवरात्रि जैसी ही लगेगी।
कैसे जाएं: मॉरीशस के लिए दिल्ली व मुंबई आदि शहरों से कई एयरलाइंस की उड़ानें हैं। दिल्ली से मॉरीशस की सीधी उड़ान लगभग साढ़े सात घंटे का समय लेती है। कई उड़ानें दुबई के रास्ते भी हैं। मॉरीशस का वापसी किराया दिल्ली से 26 हजार रुपये से शुरू हो जाता है। मॉरीशस जाना बेशक महंगा है लेकिन वहां रुकने के लिए लग्जरी रिजॉर्ट के अलावा बजट होटल भी बड़ी आसानी से मिल जाएंगे।

Venice
रोमांटिक: वेनिस
दो लफ्जों की है इसकी कहानी
बॉलीवुड के दीवाने हिंदुस्तानी इस अनूठी जगह को अमिताभ बच्चन-जीनत अमान पर फिल्माए गए ग्रेट गैम्बलर फिल्म के उस बेहद लोकप्रिय गीत से बाखूबी पहचानते हैं। वेनिस की गलियों (यानी नहरों) में गंडोला पर सैर दुनिया में सबसे रोमानी कल्पनाओं में से एक मानी जाती है। वेनिस अद्भुत शहर है। इटली का यह शहर या तो नावों पर घूमा जा सकता है या फिर पैदल। यह शहर भी अपने आप में 117 द्वीपों का समूह है। एक उथले लैगून में 177 नहरों से ये द्वीप बने हैं और आपस में चार सौ से ज्यादा पुलों से जुड़े हैं। नहरों की यह संरचना वेनिस से इस कदर जुड़ी हुई है कि दुनियाभर में किसी भी शहर में इस तरह की संरचना को नाम वेनिस से ही मिलता है। पूरी तरह पानी पर बसा यह शहर दुनियाभर के सैलानियों में इतना लोकप्रिय है कि तीन लाख से भी कम आबादी वाले शहर में रोजाना किसी भी वक्त कम से कम पचास हजार सैलानी मौजूद होते हैं। कोई हैरत की बात नहीं क्योंकि वेनिस की गिनती दुनिया के सबसे खूबसूरत शहरों में होती है। अपनी कला, शिल्प, फैशन व संगीत के लिए भी वेनिस की दुनियाभर में लोकप्रियता है। उतना ही मशहूर यहां का थिएटर भी है। शहर की संरचना कितनी अनूठी है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुख्य वेनिस लगभग छह सौ सालों से लगभग वैसा ही है।
कैसे पहुंचे: वेनिस के भीतर तो सबकुछ पानी पर है। लेकिन इटली की मुख्य भूमि से वेनिस के उत्तरी सिरे तक पहुंचने के लिए सड़क व रेल संपर्क, दोनों ही हैं। वेनिस के लिए हवाई अड्डा समुद्र के उस पार इटली की मुख्य भूमि में मेस्त्रे के निकट मार्को पोलो हवाई अड्डा है। यूरोप में म्यूनिख, पेरिस व विएना के अलावा मास्को तक से सीधी ट्रेनें हैं। रोम व मिलानो का सफर भी वेनिस से कुछ ही घंटे का है। वेनिस का कार पार्क यूरोप का सबसे बड़ा कार पार्क है क्योंकि वेनिस आने वाली सभी कारें वहीं तक आ सकती हैं, शहर के भीतर नहीं।

Jag Niwas in Pichola Lake at Udaipur
शाही: उदयपुर
यहां का हर अंदाज राजसी है
झीलों की नगरी कहे जाने वाले उदयपुर को विदेशी सैलानियों में भारत के सबसे लोकप्रिय शहरों में से एक कहा जा सकता है। छोटा सा खूबसूरत शहर अपने इतिहास के लिए बहुत प्रसिद्ध है, खास तौर पर महाराणा प्रताप से जुड़े इतिहास के लिए। हालांकि राणा प्रताप को अपने जीवन में राजसी सुख कम ही मिला लेकिन उदयपुर घूमने आने वाले सैलानियों के लिए अब राजसी विलास जमकर है। दुनिया की कई सबसे खूबसूरत व लग्जरी होटलें उदयपुर में हैं। इनमें पिछोला झील में स्थित लेक पैलेस होटल, इसी झील के दूसरे किनारे स्थित नई बनी उदय विलास होटल और राजपरिवार के निजी निवास में बनी शिव निवास पैलेस होटल शामिल है। दरअसल उदयपुर शहर के आसपास राजे-रजवाड़ों की सैकड़ों साल पुरानी कई संपत्तियां अब होटलों में तब्दील हो चुकी हैं। उनकी बनावट, मेहमानवाजी, साज-सच्चा, खान-पान, ये सब कुछ एक राजसी अनुभव देते हैं। उदयपुर शहर की खूबसूरती को देखने के अलावा सैलानी इस राजसी अनुभव को लेने भी आते हैं।
यही वजह है कि दुनियाभर के सेलेब्रिटी अपनी शादियों व अन्य निजी आयोजनों के लिए उदयपुर आते हैं। देवीगढ़ ने इसकी शुरुआत की। पिछौला झील में ही जग मंदिर में रवीना टंडन की शादी हम सबको याद होगी।  जग मंदिर रानियों की सैरगाह रहा है। आज यह हाई क्लास इवेंट्स का केंद्र है। इन राजसी ठाठ-बाट का असर यह है कि शहर की कई पुरानी हवेलियां भी हेरीटेज होटलों में तब्दील हो चुकी हैं। इसलिए जो लग्जरी होटलों में नहीं रुक सकते, वे इन होटलों में रुक सकते हैं। उदयपुर शहर में तीन बड़ी झीलें हैं- पिछौला झील, फतेह सागर और स्वरूप सागर। इसके अलावा दूध तलाई है। ये सारी झीलें आपस में जुड़ी हैं। रुकने की इन जगहों के अलावा उदयपुर में कई रेस्तरां झीलों के किनारे हैं। वहां के माहौल में पारंपरिक खाने का अनुभव भी राजसी है।
कैसे जाएं: उदयपुर दिल्ली से मुंबई जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 8 पर स्थित है। दिल्ली से इसकी दूरी लगभग साढ़े सात सौ किलोमीटर है। दिल्ली, जोधपुर, जयपुर, अहमदाबाद व मुंबई से उदयपुर के लिए सीधी ट्रेनें हैं। साथ ही दिल्ली, मुंबई समेत कई शहरों से उदयपुर के डबोक हवाई अड्डे के लिए रोजाना सीधी उड़ानें भी हैं।

Beauty of Himalayas
पहाड़: नेपाल
सब तरफ नजारा हिमालयी है
एवरेस्ट की धरती नेपाल किसी परिचय का मोहताज नहीं। हम भारतीयों का नेपाल से वैसे भी भावनात्मक रिश्ता सा है। हिमालय का आकर्षण दुनियाभर से सैलानियों को नेपाल खींच लाता है। यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी नेपाल के लिए आय के सबसे बड़े जरियों में से है। नेपाल में सैलानी पहाड़ व नदी से जुड़ी हर गतिविधि का रोमांच ले सकते हैं। इनमें पर्वतारोहण, ट्रैकिंग, रॉक क्लाइंबिंग, राफ्टिंग, जंगल सफारी, पैराग्लाइंडिंग, माउंटेन फ्लाइट, माउंटेन बाइकिंग, बंजी जंपिंग आदि सब शामिल है। काठमांडू घाटी के अलावा पोखरा, चितवन, लुंबिनी, जनकपुर, एवरेस्ट क्षेत्र, अन्नपूर्णा रेंज, लंगतांग क्षेत्र आदि में पहाड़ का मजा लिया जा सकता है। जोखिमभरी होने के बावजूद काठमांडू से लुकला तक की उड़ान समय बचाने के लिए बहुत पसंद की जाती है। लुकला से ही एवरेस्ट की चढ़ाई शुरू होती है। इसके अलावा नेपाल में कई जगहों से एवरेस्ट देखने के लिए अल्ट्रालाइट या माइक्रोलाइट विमानों से सैर भी कराई जाती है।
कैसे जाएं: भारतीयों को नेपाल जाने के लिए न पासपोर्ट चाहिए होता है और न वीजा। उसके अलावा उत्तराखंड के कुमाऊं इलाके से लेकर उत्तर प्रदेश व बिहार तक सड़क मार्ग से नेपाल जाने के कई रास्ते हैं। विदेश जाने का क्या शानदार तरीका है। राजधानी काठमांडू के लिए भारत के कई शहरों से सीधी उड़ान भी है। एवरेस्ट की चढ़ाई बेशक महंगी है लेकिन नेपाल में रुकने व घूमने के कई सस्ते विकल्प हैं। लेकिन भीतरी इलाकों में रास्ते अभी और बेहतर किए जा सकते हैं।